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रानी बनकर आई मणिकर्णिका, महारानी बनकर विदा हुई

अखिलेश श्रीवास्तव

रांची, 18 जून झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक दूसरे के पर्याय जैसे हैं। वे केवल झांसी के लिए ही नहीं लड़ीं, क्रांतिकारियों का भी बढ़-चढ़कर साथ दिया। मनु, मणिकर्णिका, छबीली जैसे कर्ण प्रिय उपनामों से जब यह बालिका बचपन में पुकारी जाती होगी तो क्या किसी ने सोचा होगा कि अपनी प्यारी मनु को इतने संघर्षों वाले जीवन को जीना पड़ेगा ? क्या काशी के अस्सी घाट ने कभी सोचा होगा, जिस मणिकर्णिका के मुख से किलकारियां इन घाटों पर गूंज रही हैं, वही मुख कभी भीषण युद्ध का उद्घोष करेगा और अंग्रेजों को भयभीत कर देगा। मनु की मां सच में भागीरथ है, जिन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई जैसी गंगा को धरा पर उतारा। यह गंगा मणिकर्णिका बन काशी से प्रवाहित हो झांसी और ग्वालियर तक पहुंची और भारतीय स्वतंत्रता और इतिहास का ऐसा सितारा बन गई जो हमेशा भारत के गौरव को प्रकाशित और सुशोभित करता रहेगा।

पेशवा बाजीराव के कारिंदे मोरोपंत जी ने काशी में रहते अपनी प्यारी बेटी मनु को शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दिलाई क्योंकि मनु का तेज इतना था कि घुड़सवारी, तलवारबाजी उसके लिए खेल थे। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं लक्ष्मीबाई तलवार से खेलती थी। हमें भले ही कुछ मालूम ना हो पर विधि को तो सब मालूम है। विधि ने जिसके लिए जो तय किया है, उसका उसे सामना करना ही है, बात सिर्फ तैयारी की है कि कौन कितनी तैयारी से उस विधान का सामना करता है। युद्ध कला में पारंगत हो रही मोरोपंत जी की इस बेटी को विधि के विधान ने 1850 में झांसी की रानी बना दिया।

हर्षोल्लास के बीच यह किसको पता था कि मनु रानी लक्ष्मीबाई नहीं महारानी बनने की यात्रा पर चल निकली है। जिस आजादी की लौ को रानी ने अट्ठारह सौ सत्तावन में जलाया था, उसी सर्वस्व समर्पण के संकल्प से ही तो 47 की स्वाधीनता का सूर्य दैदीप्यमान हुआ। रानी लक्ष्मीबाई के विवाह और झांसी के वारिस के लिए हुए संघर्षों से कोई अनभिज्ञ नहीं है। झांसी के राजा गंगाधर राव से विवाह और उसके बाद पुत्र की प्राप्ति ने राज्य को उत्सवों में डुबो दिया था। हर्षोल्लास का कोई ठिकाना नहीं था। चार माह के पुत्र की मृत्यु ने रानी की वीरता की कितनी परीक्षा ली होगी, यह तो भगवान ही जानता होगा।

अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र के लिए कितनी अड़चनें डाली और झांसी राज्य को हड़पने के लिए जो जुल्म हो सकता था, वह किया। राजा के स्वर्ग सिधारने के बाद रानी पर वज्रपात हो गया। मात्र छब्बीस वर्ष की उम्र में वैधव्य का दुख झेलना पड़ा। पर रानी ने हार नहीं मानी। वह चाहती तो अंग्रेजों से संधि कर अपना जीवन दूसरे राजाओं की तरह सुखमय कर सकती थी। पर रानी, धर्म की रक्षा के लिए कर्म में प्रवृत्त हो गई। ह्यूरोज जैसे अफ़सरों के सारे प्रयास उस महारानी के अदम्य साहस और वीरता के सामने बौने साबित हुए। रानी ने घुटने नहीं टेके, स्वाभिमान के साथ बलिदान करना पसंद किया। दामोदर को रानी का जैविक पुत्र ना होने का तर्क गढ़कर अंग्रेजों ने झांसी के किले पर कब्जा कर लिया।

मार्च 1854 में रानी को अकेला छोड़कर रानी महल में स्थानांतरित होने का आदेश जारी कर दिया। जब एलिन नाम के अंग्रेज अधिकारी ने दरबार में ये आदेश सुनाया तो लक्ष्मीबाई ने ललकारते हुए कहा “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”। पर अंग्रेजों ने दुर्ग पर उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। रानी ने डलहौजी को पत्र लिखा पर सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने राजाओं को संगठित करना प्रारंभ कर दिया। अपनी सुरक्षा को मजबूत किया, एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया। जिसमें महिलाओं को भी सैन्य प्रशिक्षण के साथ शामिल किया।

रानी लक्ष्मीबाई ने इस बीच क्रांतिकारियों का साथ दिया। 1857 के संग्राम की चिंगारियां झांसी पहुंच चुकी थीं। जब अंग्रेजों को रानी के क्रांतिकारियों के साथ मिल जाने का पता चला तो अंग्रेजों ने हमला कर दिया। पर, अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी। रानी ने झांसी पर फिर अपना शासन वापस ले लिया और अप्रैल 1858 तक झांसी पर राज किया। राज्य खोने के बाद लेफ्टिनेंट वाकर ने एक बार फिर झांसी को घेरना प्रारंभ कर दिया। हयूरोज की अगुवाई में ब्रितानी सेना ने झांसी पर फिर हमला कर दिया।

महारानी की वीरता को यही पंद्रह दिन बखान करते हैं। जब झांसी के दक्षिणी मैदान पर अंग्रेजी पलटनों ने अपने तंबू लगा दिए। यह देखकर रानी डरी नहीं। युद्ध के प्रबंध में जुट गई। महारानी को धक्का तब लगा, जब मोर्चा बांधने के लिए झांसी के जयचंदों ने अंग्रेजों की मदद की। पर रानी की सेना और उनके साहस ने अंग्रेजों की तोपों का 11 दिन तक सामना किया। युद्ध के चौथे दिन अंग्रेजी तोपों के गोलों ने किले के दक्षिणी बुर्ज को बंद करा दिया, पर रानी का हौसला नहीं तोड़ सके। रानी ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया। सातवें दिन अंग्रेजों ने किले के पश्चिमी मोर्चे को तोड़ डाला, रानी लक्ष्मीबाई ने अपने कारीगरों की चतुरता से सुबह तक फिर मोर्चाबंदी कर ली। सुबह वहां से अंग्रेजों की सेना पर ऐसे गोले बरसाए की अंग्रेजी सैनिकों में भगदड़ सी मच गई। झांसी के सामर्थ्य से ज्यादा, महारानी दस दिन तक लड़ती रही। परंतु जब ग्यारवें दिन जिस झांसी के लिए यह रानी रणचंडी बनी थी, उसी झांसी के कुछ गद्दारों ने अंग्रेजों से पैसे लेकर घास के गट्ठर सर पर रख कर किले पर अंग्रेजों को चढ़ा दिया।

रानी ने दामोदर राव को लेकर कालपी की तरफ प्रस्थान किया, जहां तात्या टोपे सहित अन्य सेनानी उनके साथ शामिल हो गए। रानी का अंग्रेजों की सेना ने पीछा करना शुरू कर दिया। लंबी यात्रा के कारण रानी के घोड़े ने दम तोड़ दिया। यमुना तट पर अंग्रेजी सेना ने रानी को घेर लिया, पर रानी ने वीरता से लड़ते हुए लेफ्टिनेंट वाकर को मार गिराया। फिर रानी का सामना 15 जून, को कोट की सराय में जनरल स्मिथ से हुआ, जहां से उसे हार कर भागना पड़ा।

इसकी खबर लगते ही जनरल ह्यूरोज रानी से युद्ध करने आया, थकी हारी रानी अदम्य साहस के साथ लड़ती रही और शत्रुओं को काटती रही। पर रानी का घोड़ा सोन रेखा के प्रवाह को पार न कर सका। पीछे से वार कर रहे कायर अंग्रेजी सिपाहियों ने रानी के सिर पर घातक वार कर दिया, दूसरे ने पेट में गोली मार दी, तीसरे ने तलवार घोंप दी। बावजूद रानी ने तीनों को मार गिराया। इसके बाद महारानी ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। रानी के साथ रामचंद्र राव देशमुख लड़ रहे थे। रानी के वचन अनुसार रामचंद्र राव ने बड़ी सावधानी से वीरांगना को उठाया और सुनसान जगह पर चिता तैयार कर 18 जून 1858 को भागीरथी की इस बेटी को अंतिम विदाई दी।

भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्ण अक्षरों में महारानी लक्ष्मीबाई का नाम हमेशा एक ऐसे सूर्य की तरह चमकता रहेगा जो भारत के शौर्य की कहानी सदियों तक कहता रहेगा।


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