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मद्रास उच्च न्यायालय ने ‘विजयादशमी’ मनाने के लिए एकत्रित होने वाले आरएसएस स्वयंसेवकों पर दर्ज आपराधिक केस रद्द किया

मद्रास उच्च न्यायालय ने ‘विजयादशमी’ मनाने के लिए एकत्रित होने वाले आरएसएस स्वयंसेवकों पर दर्ज आपराधिक केस रद्द कियामद्रास उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। इन पर 2 अक्तूबर 2025 को तिरुपत्तूर जिले के अंबुर में विजयादशमी उत्सव और संगठन का 100वां स्थापना दिवस मनाने के लिए बिना पूर्व अनुमति के एकत्रित होने पर केस दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ता अंबुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 189(3), 223, 126(2) और 293 के तहत मुकदमे का सामना कर रहे थे। यह मामला ग्राम प्रशासनिक अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत के बाद सामने आया था। आरोप था कि RSS का झंडा लेकर एकत्रित कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक परिवहन में बाधा उत्पन्न की और निर्देश दिए जाने के बावजूद वहां से हटने से इनकार कर दिया था। पुलिस ने मामले में शिकायत के केवल नौ दिनों के भीतर ही ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट (आरोप पत्र) दायर कर दी थी। चार्जशीट में केवल चार गवाह थे – ग्राम प्रशासनिक अधिकारी, दो ग्राम सहायक और जांच अधिकारी।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एम. निर्मल कुमार ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए और याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय सुनाया।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी –

“यह एक स्वीकृत तथ्य है कि याचिकाकर्ता एक साथ इकट्ठा हुए थे, जो उनका मौलिक अधिकार है। इस मामले में, किसी भी आम नागरिक ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई और याचिकाकर्ताओं के इस जमावड़े से कोई भी व्यक्ति प्रभावित नहीं हुआ। अदालत यह पाती है कि याचिकाकर्ता केवल विजयादशमी उत्सव और अपने संगठन का 100वां स्थापना दिवस मनाने के लिए वहां एकत्रित हुए थे।”

न्यायालय ने पूरी कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of process of law) मानते हुए तीन प्रमुख आधारों पर रद्द कर दिया –

कोई स्वतंत्र गवाह नहीं – घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई, लेकिन अभियोजन पक्ष ने किसी भी स्वतंत्र या आम नागरिक को गवाह नहीं बनाया। गवाह के तौर पर केवल सरकारी अधिकारियों (VAO और जांच अधिकारी) को ही पेश किया गया, जो शिकायत की सत्यता पर गंभीर संदेह पैदा करता है।

निषेधाज्ञा का कोई प्रमाण नहीं – रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था जो यह दर्शाता हो कि जनता को किसी भी निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) की सूचना दी गई थी, या याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर उसकी अवहेलना की हो।

कोई सार्वजनिक उपद्रव नहीं – अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि इस जमावड़े से वास्तव में कोई परेशानी या उपद्रव हुआ था।

न्यायालय ने अपने पुराने निर्णय ‘जीवनानंदम और अन्य बनाम पुलिस निरीक्षक और अन्य (2018)’ का हवाला देते हुए कहा कि केवल गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होना ही अपने आप में अपराध के गठन के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उससे कोई वास्तविक अपराध न हुआ हो।

न्यायाधीश कहा – “यह देखा गया है कि याचिकाकर्ताओं ने संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का पालन किया था। अंतिम रिपोर्ट (चार्जशीट) में लगाए गए आरोप पूरी तरह से सामान्य प्रकृति के हैं और इन प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया है।”

इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने मामले को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया।

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