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अंतर्मन के आंगन में रंगोत्सव : होली उत्सव

अंतर्मन के आंगन में रंगोत्सव : होली उत्सवरांची, 15 मार्च : हमारी चेतना में अहर्निश होली चल रही है। रंगों का उत्सव जारी है। सांसारिक रूप से होली का उत्सव अंतर्मन पर लगातार चलने वाली तन, मन और चिंतन के सरस की ओर इंगित करता है। होली के इस उत्सव को देखकर ही मीराबाई ने कहा कि रे मन! खूब खेलो होली। यह होली हमारी चेतना का उत्सव है। चेतना में प्रवाहित विविध रंगों का उत्सव है। इसमें रंग ही रंग है। कबीर ने कहा कि जिसने मन की गांठ नहीं खोली, वह होली के उत्सव को महसूस नहीं कर सकेगा। यह तो अंतर्मन में रिसता रहता है और तन के कोर कोर को भंींगोता रहता है। होली का तात्पर्य है-रस के साथ रंग। वह कहते हैं कि गांठ खेल परखा नाहिं या विधि व्यवहार। अगर मन का गांठ खुलेगा तभी वह गाढ़ा और शाश्वत रंग दिखेगा।

अस्तित्व में सदैव उत्सव है। इस विराट में प्रतिदिन होली मनाय जाता है। प्रकृति में, आकाश में सूर्य की किरणांे में रंगों का उत्सव सुबह से शाम तक चलता रहता है। रोजाना ही प्रकृति में रंग छिटकते हैं। प्रतिदिन बहुरंगी फूल खिलते हैं। हर नये कोंपल और झरते पŸो कि साथ रंगों का रस हमारे मन पर चढ़ता है। रंगों का यह प्रवाह ही होली है। हम मानव के लिए साल में एक होली है, एक दिवाली है। प्रकृति सदैव उत्सव मनाती है। इस विराट में जंगल, पौधे, पशु, नदियों के कोई अगल से होली का दिन नहीं है। उनका पूरा जीवन ही होली है, हर दिन उत्सव है। प्रकृति स्वतंत्र है, इस विराट में मानव को छोड़कर सब स्वावलंबी है, वे प्रतिपल जगत के उत्सव के साथ गमन कर रहे है। इसलिए उनके जीवन में सदैव ऊर्जा है। ऊर्जा से परिपूर्ण अस्तित्व को अलग से उत्सव की जरूरत नहीं है।
अंतर्मन के आंगन में रंगोत्सव : होली उत्सवस्वाभाविक मानव जीवन ही फागुन है। जीवन में सगीत का संचार हो, गीत की धून बजे, और नृत्य का भाव हो, इसलिए उत्सव है। उत्सव हमारे जीवन में पुलक लाने के लिए है। इससे जीवन प्रसन्न हो, मुदित बने और थिरकन आए। होली केवल बाहर की नहीं अंदर की भी होली है। जिस प्रकार लकड़ी जला कर होलिका दहन संभव नहीं है। उसी प्रकार रंग लगाकर होली का आनंद पूरा नहीं हो सकता। मन के सभी विकारों और आसक्तियों को जलाना ही होलिका दहन है। उसी प्रकार चेतना को रस रंग में सराबोर करना ही होली है। होली का उत्सव सनातन है। यह शाश्वत है। कृष्ण के साथ वृंदावन में होली का महारास है तो राम के साथ मर्यादा का आरोहण है। यह भी चेतना को शाश्वत रंगीन बनाने की यात्रा है। फिर महादेव के साथ अनंत होली है। शिव होली है। होली में शिव ही रंग है। यानी जो शुभ है। श्रेष्ठ है, उससे अपनी चेतना का आरोहण कराना। अंतर्मन को रंगीन करना । इसमें शांति का सफेद, प्रेम का लाल, करुणा का नारंगी और उल्लास का हरा समावेशित है 

प्रेम के रंग से परम की प्राप्ति होती है, तो होली के साथ सब रंग का संयोजन निश्चित ही व्यक्ति को प्रेम के विविध सोपान तक पहुंचाता है। होली के रंग उत्सव रचते हैं। दिल में उमंग बढ़ाते हैं। कुंठा से मुक्त करते हैं। भेद मिटाकर सभी को अभेद रूप से अभिन्न कर देते हैं। होली के रस के कारण ही तुलसी ने मानस में लिखा है कि सगुणोपासक मोक्ष न लेहिं। जो सगुणी हो, जिन्होंने परम में सगुण का स्वरूप दर्शन किया है, वह मोक्ष क्यांेकर लेगा ! जब मोक्ष देह से आबद्ध है, जब इंद्रियों से प्रेम के परम रस का अस्वाद संभव है, तब कौन नहीं मुक्ति को नया अर्थ देना चाहेगा।

भारतीय संस्कृति में मुक्ति के लिए मन, वचन, कर्म और ध्यान को माध्यम बताया गया है। होली ही ऐसा उत्सव है जिसमें प्रेम रस में मन सराबोर रहता है। होली के सप्तरंगी छटा में विचारा निमग्न होता है और उसके सांस्कृतिक एवं सामाजिक धारा के साथ कर्मयोग की साधना चलती है। होली जीवन कर्म है। तो उसकी अंतर्यात्रा से मन और वचन के वर्चनाओं को नया अर्थ देने का माध्यम है। होली देह को नहीं बल्कि यह अंतस् को भींगोता है। देह पर रंग की बरसात को इंद्रियां अनुभव करती है, और मन तथा वचन पर होली का सुवास हमारी आत्मा का आस्वाद बनता है।

ईश्वर की ओर गमन का सरल मार्ग प्रेम और भक्ति का मार्ग है। इसमें होली का रंग अदभूत है। इसमें प्र्रेम है, उमंग है और भक्ति भी है। होली की अपनी मस्ती है। इसका अपना ठाट है। इसका अपना फाग है। होली सबका है। दिगंबर भी मसाने में होरी खेलते हैं, और शिव को रिझाते हैं। एक तरफ बाबा की होली है, तो दूसरी तरफ अवध में रघुनंदन भी संगे संबंधियों के साथ होली में मस्त है। होली में सूर भी लहालोट है, और तुलसी भी राघव रंग से ओतप्रोत है। एक रघुनंदन को रंगते हैं, तो दूसरा यदुनंदन को रचते हैं। गंगा पर अवधूत की होरी है, सरयू पर विभूतियों की होली है और यमुना तट पर प्रेमियों का महारास है। सब ओर रस, रंग और लास्य का महा उत्सव है। सूरदास की पंक्तियां हैं- हरि संग खेलत हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर अंतर को अनुराग।

यह धरती का उत्सव है और धरती अपने सप्तरंगी आभा और छंटा से पूरी वसुधा को रंगीन बनाये हुए है। होली गोपियों के वृंदावन से प्रेमरस के साथ चलती है और अवध के लोक में चिंतन रस को पसारती है। फिर काशी में गंगा के किनारे मसाने पर पूरे अंतर्मन को रंगीन कर देती है। यह संसार रंग से परिपूर्ण है, अतएव जीवन को भी रंगों से भरा होना चाहिए। हरेक व्यक्ति भी रंगों का समुच्चय है। हमारी चेतना का स्वभाव ही उत्सव का है। उत्सव के साथ रंग को जोड़ दिया जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है। वसंत का मौसम रंगों के उत्सव का है। इसमें रंग पंचमी है, रंग एकादशी है, तो वसंत पंचमी, और होली है। प्रकृति और मानव मन में फागुनाहट का रस और रंग समाया रहता है। एक तरफ प्रकृति की सप्तरंगी छटा और दूसरी आर मानवीय जीवन मंे भौतिक सुख का बहुरंग समाज में उल्लास बिखेरता है। फागुन और चैत को वसंत का माह माना जाता है। इस प्रकार हिंदू कैलेंडर में साल का अंत और नये साल का शुरूआत वसंत से होता है। इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि मैं ऋतुओं में वसंत हूं। यह माह सात्विक शक्तियों की विजय का प्रतीक है। पहलाद का होलिका पर विजय इसका संुदर उदाहरण है। होली में कई रंग सिमटे हैं। यह राधा कृष्ण के मिलन, बाबा विश्वनाथ और पार्वती के अन्नय प्रेम और श्री राम के समाज के साथ पुनर्मिलन का उत्सव है।

उत्सव हमारी चेतना का मूल स्वभाव होता है। जो उत्सव मौन से मुखरित होता है वही वास्तविक होता है। और उत्सव के साथ पवित्रता और सहजता जोड़ दिया जाए तो वह पूर्ण रूप धारण करता है। ऐसा होने पर ही हमारे शरीर, मन और आत्मा तीनों इस उमंग में शामिल हो जाते हैं। जब चेतना उत्सव मनाती है, तो वह जीवन ज्यादा बहुआयामी एवं बहुरंगी होता है। जब भी किसी चेतन सत्ता में आनंद की वर्षा होने लगती है, हृदय में उमंग होने लगता है तो शरीर नर्तन करता है, तो वे फूल की तरह खिलने और आकाश की ओर उन्मुख हो जाते है। परमात्मा से मिलने की यह आतुरता है। जब हम जागृत होते हैं, चैतन्य की अवस्थ को प्राप्त करते है तो ईश्वर का प्रसाद मिलता है। फूलों की पंखुड़ियों में रस, गंध, रंग और फल के रूप में मिठास एवं तृप्ति मिलती है, तो मनुष्य उसके अनुग्रह से ओतप्रोत हो जाता है।


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