डॉ. शुचि चौहान
पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच उस गहरे संबंध को स्मरण करने का दिन है, जिसके बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जैव विविधता का ह्रास, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन जैसी समस्याएँ पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं, तब इतिहास के उन व्यक्तित्वों का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है, जिन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारत की ऐसी ही एक प्रकृति प्रेमी थीं अमृता देवी बिश्नोई, जिनका नाम पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने केवल वृक्षों को बचाने का प्रयास नहीं किया, बल्कि यह सिद्ध कर दिया कि प्रकृति की रक्षा मानव जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। उनका बलिदान आज भी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में प्रेरणा का एक अद्वितीय उदाहरण है।
राजस्थान की मरुभूमि में स्थित खेजड़ली गाँव में सन् 1730 में घटित घटना विश्व पर्यावरण इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। उस समय राजस्थान में महाराजा अभयसिंह का शासन था। जोधपुर में एक नए महल के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता थी। राजा के आदेश पर सैनिकों और कर्मचारियों को आसपास के क्षेत्रों से वृक्ष काटने के लिए भेजा गया। वे खेजड़ली गाँव पहुँचे। जब राजा के कर्मचारियों ने खेजड़ी के वृक्षों को काटना शुरू किया, तो गुरु जंभेश्वर की शिक्षाओं से प्रेरित और वृक्षों व जीवों को जीवन का अभिन्न अंग मानने वाली अमृता देवी ने इसका विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जीवित वृक्षों को काटना पाप है, वे किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगी। किंतु सैनिक राजा का आदेश बताते हुए वृक्ष काटने पर अड़े रहे। तब अमृता देवी ने वह ऐतिहासिक निर्णय लिया, जिसने उन्हें अमर बना दिया। उन्होंने खेजड़ी के एक वृक्ष को अपनी बाहों में जकड़ लिया और घोषणा की कि वृक्ष को काटने से पहले उन्हें काटना होगा। इसी संदर्भ में उनसे जुड़ा प्रसिद्ध वाक्य प्रचलित है – “सर साटे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण”। अर्थात यदि वृक्ष बचाने के लिए सिर भी कट जाए तो यह सौदा सस्ता है।
सैनिकों ने चेतावनी को अनसुना कर दिया और अमृता देवी का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन यह बलिदान यहीं समाप्त नहीं हुआ। उनकी तीनों पुत्रियाँ – आसू, रत्नी और भागू – भी वृक्षों से लिपट गईं और उन्होंने भी अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। इस घटना की सूचना पूरे क्षेत्र में फैल गई और बड़ी संख्या में लोग खेजड़ली पहुँचने लगे। एक-एक व्यक्ति वृक्षों से चिपकता गया और सैनिक उन्हें काटते गए। अंततः 363 स्त्री-पुरुषों ने वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह विश्व इतिहास का एक बड़ा और संगठित वृक्ष-रक्षा आंदोलन था, जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए इतने बड़े पैमाने पर बलिदान दिया गया।
इस घटना का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि अंततः महाराजा अभयसिंह को वृक्ष कटाई रुकवानी पड़ी। उन्होंने क्षेत्र में वृक्षों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए विशेष आदेश जारी किए। और अमृता देवी व उनके साथियों का बलिदान केवल एक स्थानीय घटना नहीं रहा, बल्कि उसने शासन को भी पर्यावरण संरक्षण के लिए बाध्य कर दिया। यह प्रमाण है कि जब समाज अपने मूल्यों के प्रति दृढ़ संकल्पित होता है तो सत्ता को भी उसकी आवाज सुननी पड़ती है।
अमृता देवी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने वृक्षों के लिए प्राण त्यागे, बल्कि इसलिए भी है कि उनका दृष्टिकोण आधुनिक पर्यावरण विज्ञान की मूल अवधारणाओं से मेल खाता है। आज वैज्ञानिक बताते हैं कि वृक्ष जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं, भूजल संरक्षण में सहायता करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, जैव विविधता को संरक्षित करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके पृथ्वी को गर्म होने से बचाते हैं। खेजड़ी का वृक्ष विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी माना जाता है। यह पशुओं के लिए चारा प्रदान करता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और कम पानी में भी जीवित रहता है। संभव है कि उस समय लोगों को आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली का ज्ञान न रहा हो, किंतु उनके अनुभव और प्रकृति के साथ गहरे संबंध ने उन्हें यह समझा दिया था कि वृक्षों का विनाश जीवन के विनाश के समान है।
आज जब पर्यावरण दिवस मनाया जाता है तो अक्सर पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। अमृता देवी का संदेश वृक्ष लगाने से आगे बढ़कर वृक्ष बचाने का संदेश देता है। अनेक बार हम लाखों पौधे लगा देते हैं, किंतु उनकी देखभाल नहीं करते। दूसरी ओर पुराने और विकसित वृक्ष सड़कों, भवनों या अन्य परियोजनाओं के नाम पर काट दिए जाते हैं। एक परिपक्व वृक्ष को विकसित होने में दशकों लगते हैं, जबकि उसे काटने में कुछ मिनट। इसलिए पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक अर्थ केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि वर्तमान प्राकृतिक संपदा की रक्षा करना भी है।
अमृता देवी का जीवन यह भी सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या विशेषज्ञों का कार्य नहीं है। इसमें आम नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। तब खेजड़ली में कोई बड़ा संगठन नहीं था, कोई आधुनिक आंदोलन नहीं था, कोई मीडिया नहीं था और न ही किसी प्रकार का राजनीतिक समर्थन था। लेकिन साधारण लोगों ने प्रकृति की रक्षा के लिए असाधारण साहस का परिचय दिया। यह दर्शाता है कि पर्यावरणीय चेतना का सबसे मजबूत आधार जनभागीदारी होती है।
आज पूरा विश्व अनेक पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहा है। तापमान लगातार बढ़ रहा है, वर्षा के पैटर्न बदल रहे हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, वन सिकुड़ रहे हैं और अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी हैं। ऐसे समय में अमृता देवी का बलिदान केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी है।
पर्यावरण दिवस पर अमृता देवी को स्मरण करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उनका संघर्ष प्रकृति के प्रति भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है। भारतीय परंपरा में पृथ्वी को माता, नदियों को देवी, वृक्षों को पूजनीय और पशु-पक्षियों को सह अस्तित्व का साथी माना गया है। अमृता देवी ने अपने बलिदान से यह सिद्ध किया कि प्रकृति के प्रति श्रद्धा केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं, बल्कि जीवन व्यवहार का हिस्सा है।
उनकी स्मृति में वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को भारत सरकार द्वारा “अमृता देवी बिश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार” भी प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार इस बात का प्रतीक है कि राष्ट्र उनके योगदान का आदरपूर्वक स्मरण करता है। किंतु उनका सबसे बड़ा सम्मान तब होगा, जब हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएँगे।
जल संरक्षण, वृक्षों की रक्षा, प्लास्टिक का कम उपयोग, जैव विविधता का संरक्षण, ऊर्जा की बचत और संयमित जीवनशैली अपनाना ऐसे कदम हैं, जिनके माध्यम से हम पर्यावरण की रक्षा में योगदान दे सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाए, तो बड़े परिवर्तन संभव हैं।
अमृता देवी ने लगभग तीन सौ वर्ष पहले जो संदेश दिया था, वह आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। पर्यावरण दिवस पर अमृता देवी का स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का पुनः संकल्प है। उनका जीवन और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह प्रेरणा देता रहेगा कि पृथ्वी केवल हमारी संपत्ति नहीं, बल्कि हमारी साझा विरासत है, जिसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है।